आजीवन कारावास भुगत रहे कैदी ने बताई अपनी दर्दनाक आपबीती, NHRC से CBCID जांच की गुहार
फतेहपुर। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के बहुचर्चित वर्ष 2000 के एनकाउंटर और दोहरे हत्याकांड से जुड़े मामले में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट फतेहपुर ने मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सभी अपीलकर्ताओं के जीवित अथवा मृत होने की स्थिति की जांच कराने और विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने का आदेश जारी किया है। इसी बीच आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी श्री किशन के पुत्र ओम प्रकाश ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से पूरे मामले की CBCID जांच कराने की मांग कर दी है। इस घटनाक्रम ने 26 वर्ष पुराने इस चर्चित मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार अपराध संख्या 106/2000 थाना असोथर में भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 302, 307, 332, 336 एवं 225 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। वर्ष 2007 में इस मामले में कई आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उन्हीं में ग्राम मैकुआपुर उर्फ खबरा मजरा सरकंडी निवासी श्री किशन पुत्र शीतल उर्फ शीतलुवा भी शामिल हैं, जो वर्तमान में केंद्रीय कारागार नैनी, प्रयागराज में निरुद्ध हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजे गए प्रार्थना पत्र में श्री किशन ने अपनी पूरी घटना का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि घटना वाले दिन 4 सितंबर 2000 की सुबह वह अपने खेत में हंसिया लेकर पशुओं के लिए चारा काटने गए थे। उनके अनुसार अचानक गांव के पास पुलिस और कथित बदमाशों के बीच गोलीबारी शुरू हो गई। उन्होंने आरोप लगाया है कि मौके पर मौजूद कई ग्रामीण गोलीबारी की चपेट में आ गए और अफरा-तफरी मच गई। उनके मुताबिक उन्होंने भागने का प्रयास नहीं किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें घेर लिया और उन पर कई राउंड फायरिंग की, जिसमें एक गोली उनके दाहिने हाथ में लगी और वह घायल होकर खेत में गिर पड़े।
प्रार्थना पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि घायल अवस्था में पड़े रहने के दौरान कुछ पुलिसकर्मी उन्हें मृत समझकर कथित रूप से खत्म करने का प्रयास कर रहे थे। इसी दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे, जिन्होंने हस्तक्षेप करते हुए उन्हें बचाया। श्री किशन का कहना है कि बाद में उन्हें उपचार देने के बाद थाने ले जाया गया, जहां कथित रूप से उनके खिलाफ पुलिसकर्मियों की हत्या, हथियार बरामदगी और अन्य गंभीर आरोप दर्ज कर दिए गए। उनका आरोप है कि वह अशिक्षित होने के कारण उनसे बिना सही जानकारी दिए अंगूठा लगवा लिया गया और बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया।
प्रार्थना पत्र में श्री किशन ने यह भी दावा किया है कि पूरे मामले की जड़ गांव की पुरानी रंजिश और कथित मुखबिरी थी, जिसके कारण निर्दोष लोगों को आरोपी बना दिया गया। उनका कहना है कि कई सह-आरोपी जमानत पर बाहर आ चुके हैं अथवा उनकी मृत्यु हो चुकी है, जबकि वह वर्ष 2007 से लगातार आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से मांग की है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष CBCID जांच कराई जाए तो वास्तविक सच्चाई सामने आ सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि यदि जांच में वह दोषी पाए जाएं तो उन्हें कानून के अनुसार कठोर से कठोर सजा दी जाए, लेकिन यदि निर्दोष हों तो उन्हें न्याय मिलना चाहिए।
उधर, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट फतेहपुर ने हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में थाना प्रभारी को निर्देश दिया है कि सभी अपीलकर्ताओं के जीवित अथवा मृत होने की सत्यापित रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। यदि किसी अपीलकर्ता की मृत्यु हो चुकी हो तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार संपूर्ण कार्यवाही कर रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की जाए। इसके साथ ही वादी, ग्राम प्रधान, मृतक अपीलकर्ता के निकटतम परिजन तथा जांच अधिकारी को आधार कार्ड और नवीनतम रंगीन फोटो के साथ न्यायालय में उपस्थित कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
हालांकि श्री किशन द्वारा लगाए गए आरोप उनके प्रार्थना पत्र पर आधारित हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि न्यायालय अथवा किसी जांच एजेंसी द्वारा अभी नहीं की गई है। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में होने वाली न्यायिक प्रक्रिया और CBCID जांच की मांग पर होने वाले निर्णय पर टिकी हुई हैं। यदि इस मामले में आगे निष्पक्ष जांच के आदेश होते हैं तो 26 वर्ष पुराने इस बहुचर्चित प्रकरण में कई नए तथ्य सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।




