देश की सीमाओं की सुरक्षा में 17 वर्षों तक अपनी सेवाएं देने वाले सशस्त्र सीमा बल के एक मुख्य आरक्षी की कहानी अब गंभीर प्रशासनिक और मानवीय सवाल खड़े कर रही है। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के निवासी तथा सशस्त्र सीमा बल के मुख्य आरक्षी परमजीत तोमर को सेवा से बर्खास्त हुए चार महीने बीत चुके हैं। उनका आरोप है कि ईमानदारी से कर्तव्य निभाने के बावजूद उन्हें विभागीय अधिकारियों की कथित प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और अंततः सेवा से हटा दिया गया। अब वह अपने परिवार के भविष्य और न्याय की उम्मीद लेकर लगातार उच्च अधिकारियों के दरवाजे खटखटा रहे हैं।
परमजीत तोमर का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे सेवा काल में पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ देश की सेवा की। श्वान प्रशिक्षण एवं प्रजनन केंद्र डेरा, अलवर में तैनाती के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं और विभिन्न अवसरों पर उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रशंसा पत्र भी प्राप्त किए। उनका दावा है कि उनके सेवा रिकॉर्ड में लंबे समय तक कोई गंभीर शिकायत दर्ज नहीं थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले तीन वर्षों से कुछ वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उन्हें लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनका कहना है कि बिना किसी ठोस कारण के उन्हें बार-बार निशाना बनाया गया और उनके खिलाफ ऐसा माहौल तैयार किया गया जिससे उनकी छवि खराब हो। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके पास अपने आरोपों से जुड़े कई दस्तावेज और साक्ष्य मौजूद हैं।
परमजीत तोमर के अनुसार उन्होंने अतिरिक्त महानिदेशक सशस्त्र सीमा बल को भी प्रार्थना पत्र भेजकर व्यक्तिगत रूप से अपनी बात रखने का अवसर मांगा था। आवेदन में उन्होंने उल्लेख किया कि लगातार मानसिक उत्पीड़न के कारण वह न्याय की मांग कर रहे हैं और चाहते हैं कि उनकी पूरी बात निष्पक्ष रूप से सुनी जाए।
उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी वार्षिक गोपनीय प्रविष्टि यानी एपीएआर को जानबूझकर खराब किया गया ताकि उनके भविष्य और पदोन्नति पर असर पड़े। उनका कहना है कि जिन मुद्दों पर उन्होंने अधिकारियों से सवाल किए, उसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला और तेज हो गया।
परमजीत तोमर का कहना है कि स्कूल बस ड्यूटी के दौरान हुई एक घटना के बाद हालात और बिगड़ गए। उनका दावा है कि उन्होंने एक अन्य जवान द्वारा फैलाई जा रही कथित चर्चाओं की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारी को दी थी। इसके बाद उन्हें ड्यूटी से हटाया गया और लगातार प्रताड़ित किया जाने लगा।
उन्होंने यह भी बताया कि आठ नवंबर 2025 को उनके दादा का निधन हो गया था। उस कठिन समय में भी उन्हें केवल चार दिन की अर्जित छुट्टी दी गई। उनका कहना है कि वह समय पर ड्यूटी पर लौट आए, लेकिन इसके बावजूद उनके साथ कठोर रवैया जारी रहा।
परमजीत तोमर का आरोप है कि उनके खिलाफ अनुशासनहीनता और शराब सेवन जैसे आरोपों का वातावरण बनाया गया, जबकि उनके अनुसार पिछले तीन वर्षों में ऐसी किसी घटना का कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि पूरी विभागीय कार्रवाई पूर्वाग्रह और दुर्भावना से प्रेरित थी।
चार महीने पहले सेवा से बर्खास्त किए जाने के बाद अब उनका परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा है। उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चों की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर है। नियमित आय बंद होने के कारण परिवार के सामने रोजमर्रा के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
परमजीत तोमर ने मांग की है कि पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी या निष्पक्ष अधिकारी से जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों के पर्याप्त साक्ष्य हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए, लेकिन यदि कार्रवाई दुर्भावना के आधार पर हुई है तो उन्हें सम्मानपूर्वक सेवा में बहाल किया जाए।
यह मामला अब केवल एक कर्मचारी की नौकरी का नहीं बल्कि सुरक्षा बलों में पारदर्शिता, निष्पक्ष प्रशासनिक कार्रवाई और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े गंभीर प्रश्न भी खड़े कर रहा है। यदि लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच में सच्चाई सामने आती है तो यह विभागीय कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। वहीं यदि विभाग के पास कार्रवाई के वैधानिक और ठोस आधार हैं तो उनका स्पष्ट रूप से सामने आना भी उतना ही आवश्यक है।
फिलहाल परमजीत तोमर अपने परिवार के भविष्य को लेकर चिंतित हैं और न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी जवानी देश की सुरक्षा में समर्पित कर दी, लेकिन आज वह अपने परिवार के सम्मान, आजीविका और भविष्य की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं।




