नई दिल्ली। परिवार पेंशन को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और मानवीय फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी की मानसिक रूप से अक्षम संतान को परिवार पेंशन पाने के लिए आय प्रमाणपत्र दिखाने की जरूरत नहीं होगी। कोर्ट ने कहा कि केवल मेडिकल सर्टिफिकेट ही यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि संबंधित व्यक्ति मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम है।
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस के. राजशेखर की पीठ ने 19 जून 2025 को दिए अपने फैसले में कहा कि पेंशन कोई खैरात या उपहार नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। अदालत ने जोर देकर कहा कि जब मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति को परिवार पेंशन देने की बात आती है तो संबंधित अधिकारियों को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ काम करना चाहिए।
कोर्ट ने अपने फैसले में सेंट्रल सिविल सर्विस रूल्स (CCS) के नियम 54(6) का हवाला देते हुए कहा कि यदि सरकारी कर्मचारी का बेटा या बेटी किसी विकलांगता के कारण मानसिक या शारीरिक रूप से जीवनभर आत्मनिर्भर नहीं हो सकता, तो उसे आजीवन परिवार पेंशन मिलेगी। अदालत ने साफ कहा कि जब नियमों में केवल डॉक्टर या मेडिकल बोर्ड के प्रमाणपत्र की आवश्यकता बताई गई है, तो अधिकारी अतिरिक्त दस्तावेज या आय प्रमाणपत्र नहीं मांग सकते।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों को संविधान के अनुच्छेद 21 यानी “जीवन के अधिकार” के दायरे में देखा जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, पेंशन का उद्देश्य जरूरतमंद और असहाय आश्रितों को सुरक्षा देना है, इसलिए नियमों की व्याख्या भी मानवीय दृष्टिकोण से की जानी चाहिए।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 1995 के “भगवंती ममतानी बनाम भारत सरकार” मामले का भी उल्लेख किया गया। उस ऐतिहासिक फैसले में भी मानसिक रूप से अक्षम बेटी को परिवार पेंशन का अधिकार दिया गया था।
बताया जा रहा है कि यह मामला एक ऐसे सरकारी कर्मचारी के परिवार से जुड़ा था, जिसने अपने मानसिक रूप से अक्षम छोटे भाई के लिए परिवार पेंशन की मांग की थी। अदालत के इस फैसले को देशभर में लाखों दिव्यांग आश्रितों और उनके परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।




