नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में DDA की एक पुरानी आवासीय इमारत के पास कथित अनधिकृत निर्माण को लेकर विवाद सामने आया है। हरिहरन नामक व्यक्ति ने आरोप लगाया है कि उनके पड़ोस की संपत्ति A-2/98 में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और पुनर्निर्माण किए जाने से उनका 60 साल से अधिक पुराना मकान प्रभावित हो रहा है। पीड़ित का दावा है कि साझा दीवार के बड़े हिस्से को हटाकर उसमें या उसके सहारे बीम, पिलर और अन्य भार वहन करने वाले निर्माण किए गए हैं। इससे उनके मकान की संरचनात्मक मजबूती पर खतरा पैदा हो गया है। उनका कहना है कि इस संबंध में नगर निगम, पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारियों से कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। परेशान होकर अब उन्होंने मीडिया के माध्यम से प्रशासन का ध्यान अपनी समस्या की ओर आकर्षित किया है।
हरिहरन के अनुसार, उन्होंने अगस्त 2022 में मूल आवंटी से DDA के फ्लैट खरीदे थे। इनमें पहली और दूसरी मंजिल के फ्लैट के साथ छत पर बना कमरा और शौचालय भी शामिल हैं। उनका कहना है कि संपत्ति खरीदने के बाद उन्होंने अपने मकान में किसी प्रकार का संरचनात्मक बदलाव नहीं कराया। इसके विपरीत, उनके पड़ोस की संपत्ति A-2/98, जिसमें A-2/98/1 ग्राउंड फ्लोर तथा A-2/98/2 प्रथम और द्वितीय तल से संबंधित हिस्से शामिल बताए गए हैं, को वर्ष 2024 में मनोज कुमार, कार्यपालक अभियंता (विद्युत), संसद पुस्तकालय विद्युत कार्य प्रभाग, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD)।
ने कथित तौर पर खरीदा था। शिकायतकर्ता के मुताबिक, संपत्ति रेखा के नाम पर खरीदी गई। इसके बाद वहां पुराने DDA भवन को बड़े पैमाने पर तोड़कर नए सिरे से निर्माण और पुनर्गठन का काम शुरू कर दिया गया।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पड़ोसी संपत्ति में आवश्यक अनुमति या स्वीकृत नक्शे के बिना व्यापक निर्माण कराया गया। हरिहरन का दावा है कि दोनों मकानों के बीच लगभग नौ इंच मोटी साझा दीवार का आधे से अधिक हिस्सा हटाया गया या उसमें बदलाव किया गया। इसके बाद उसी दीवार में अथवा उसके सहारे बीम, पिलर और अन्य संरचनात्मक हिस्से लगाए गए। उनका कहना है कि इससे न केवल उनकी संपत्ति की सीमा और साझा दीवार की स्थिति प्रभावित हुई, बल्कि पुराने मकान की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा हो गई। शिकायतकर्ता के अनुसार, उनके मकान का निरीक्षण करने पहुंचे MCD से अनुमोदित संरचनात्मक इंजीनियरों ने भी इमारत की स्थिति को लेकर चिंता जताई थी। हालांकि, इस संबंध में इंजीनियरों की रिपोर्ट और तकनीकी निष्कर्षों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
पीड़ित ने निर्माण के दौरान लिफ्ट के लिए साझा दीवार के ठीक पास गड्ढा यानी लिफ्ट पिट बनाए जाने का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि वहां गर्डर लगाए गए, जिन्हें दीवार के ऊपर या उससे जोड़कर इस्तेमाल किया गया। इसके अतिरिक्त, पड़ोसी भवन में बाथरूम, शौचालय और पानी तथा सीवर की पाइपलाइन भी साझा दीवार के बिल्कुल पास या उसके भीतर की ओर बनाई गईं। हरिहरन के मुताबिक, उन्होंने बार-बार आपत्ति जताते हुए पाइपलाइन और शौचालयों को दीवार से दूर स्थानांतरित करने की मांग की, ताकि पानी के रिसाव, सीलन और पुरानी इमारत को होने वाले संभावित नुकसान से बचा जा सके। इसके बावजूद उनकी शिकायतों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
हरिहरन का कहना है कि निर्माण कार्य के दौरान भारी ड्रिलिंग मशीनों और हथौड़ों का लगातार इस्तेमाल किया गया। कई बार देर रात तक काम चलने के कारण उनके परिवार की दिनचर्या और नींद प्रभावित हुई। उनका आरोप है कि लगातार तेज आवाज और कंपन से परिवार मानसिक तनाव में रहने लगा है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, जब उन्होंने अपनी दीवार पर बीम लगाए जाने को लेकर विरोध किया, तब कथित तौर पर मकान मालिक, ठेकेदार ललन शर्मा और वहां काम करने वाले कुछ लोगों ने उन्हें और उनकी पत्नी को जान से मारने की धमकी दी। इस मामले में उन्होंने एसजेई पुलिस थाने में शिकायत करने की बात कही है। हालांकि, धमकी से संबंधित आरोपों और उन पर हुई पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
शिकायतकर्ता ने बताया कि उन्होंने मामले को लेकर MCD, पुलिस और STF सहित संबंधित एजेंसियों के समक्ष कई बार शिकायतें दर्ज कराईं। उनका कहना है कि लगातार शिकायत करने के बाद भी निर्माण कार्य पर प्रभावी रोक नहीं लग सकी। इसके बाद उन्हें न्याय के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। हरिहरन के अनुसार, हाईकोर्ट ने MCD को कथित अवैध निर्माण की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। इसके बाद नगर निगम की ओर से कुछ निर्माण हिस्सों को कंपाउंडेबल यानी नियमानुसार शुल्क और निर्धारित प्रक्रिया के तहत नियमित किए जाने योग्य बताया गया, जबकि गैर-कंपाउंडेबल हिस्सों को बुक कर उनके संबंध में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का आदेश दिया गया।
हरिहरन का आरोप है कि इसके बाद संबंधित संपत्ति के मालिक ने MCD ट्रिब्यूनल से अंतरिम स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया और यथास्थिति बनाए रखने का आश्वासन दिया। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसके बावजूद विवादित हिस्सों में निर्माण और मरम्मत का काम जारी रहा। उन्होंने दावा किया कि इस संबंध में वीडियो साक्ष्य के साथ भी नगर निगम को शिकायतें दी गईं, लेकिन उन्हें अब तक प्रभावी राहत नहीं मिली। इस पूरे मामले में न्यायालय और ट्रिब्यूनल के आदेशों की वास्तविक शर्तों, वर्तमान स्थिति तथा कथित उल्लंघन की पुष्टि संबंधित अभिलेखों से किया जाना आवश्यक है।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू RTI के माध्यम से मिली जानकारी को बताया जा रहा है। हरिहरन के मुताबिक, MCD से प्राप्त सूचना के जवाब में स्पष्ट किया गया कि भवन के पुनर्गठन या संशोधन के लिए कोई अनुमति जारी नहीं की गई थी। उनका सवाल है कि यदि संबंधित निर्माण के लिए आवश्यक अनुमति नहीं दी गई थी, तो फिर निर्माण कार्य किस आधार पर आगे बढ़ा और शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। पीड़ित ने यह भी आरोप लगाया है कि जब उन्होंने अपनी चिंताओं को अधिकारियों और संबंधित लोगों के समक्ष उठाया, तो उन्हें कथित तौर पर यह कहकर निराश किया गया कि निर्माण कराने वाले व्यक्ति का MCD में काफी प्रभाव है। हालांकि, प्रभाव के इस्तेमाल से संबंधित इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
हरिहरन का कहना है कि इस विवाद के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान की आशंका के साथ लगातार मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका दावा है कि उनका पुराना मकान दिन-ब-दिन जोखिम में पड़ता जा रहा है और साझा दीवार के आसपास किए गए निर्माण से भविष्य में गंभीर क्षति हो सकती है। परिवार की सुरक्षा, घर की मजबूती और शांतिपूर्ण जीवन को लेकर उनकी चिंता लगातार बढ़ रही है। उनका कहना है कि भारी मशीनों की ड्रिलिंग और हथौड़ों की आवाज से होने वाला ध्वनि प्रदूषण भी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है। पीड़ित ने संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि मामले को केवल सामान्य निर्माण विवाद मानकर नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि भवन की वास्तविक संरचनात्मक स्थिति की जांच कराई जाए।
हरिहरन ने सक्षम प्राधिकरण से तत्काल संयुक्त निरीक्षण कराने, विवादित निर्माण की स्वीकृतियों और अभिलेखों की जांच करने, साझा दीवार तथा पुराने भवन की सुरक्षा का स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन कराने और न्यायालय या ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की है। उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि यदि जांच में अनधिकृत निर्माण या आदेशों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार समयबद्ध कार्रवाई की जाए। साथ ही, उनकी शिकायत पर की गई कार्रवाई की लिखित रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए, ताकि उन्हें पता चल सके कि प्रशासन ने उनकी समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाए हैं।
पीड़ित का कहना है कि जब कई स्तरों पर शिकायत करने के बाद भी उन्हें राहत नहीं मिली, तब उन्होंने मीडिया का सहारा लेने का निर्णय लिया। अब उनकी मांग है कि संबंधित विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच करे और किसी भी संभावित दुर्घटना से पहले आवश्यक कदम उठाए। फिलहाल, पड़ोसी संपत्ति के मालिक, ठेकेदार और संबंधित विभागों का पक्ष उपलब्ध नहीं है। इसलिए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच, तकनीकी रिपोर्ट, RTI के मूल जवाब तथा न्यायालय और ट्रिब्यूनल के आदेशों के आधार पर ही की जा सकती है।




